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Saturday, September 19, 2009

मेरी एक कविता मेरे डैडी ने लिखी…

 

आपने इसे यदि न पढ़ा हो तो जरूर पढ़ लीजिए। यह मेरी ही कविता है। डैडी ने मुझे बताये बिना इसे अपने ब्लॉग पर छाप दिया था-

गर्मी की   छुट्टी आई है।

दीदी की मस्ती छायी है॥

पर देखो,   मैं हूँ बेहाल।

कट जाएंगे     मेरे बाल॥

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मम्मी कहती फँसते हैं ये।

डैडी कहते ‘हँसते हैं’ ये॥

दीदी कहती  ‘हैं जंजाल’।

कट जाएंगे     मेरे बाल॥

मुण्डन को है गाँव में जाना।

परम्परा से    बाल कटाना॥

नाऊ की कैंची      बदहाल।

कट जाएंगे        मेरे बाल॥

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दीदी की शॉपिंग

गाँव-गीत की लहरी होगी।

मौसी-मामी  शहरी होंगी॥

ढोल - नगाड़े   देंगे ताल।

कट जाएंगे      मेरे बाल॥

दादा – दादी, ताऊ – ताई।

चाचा-चाची, बहनें – भाई॥

सभी करेंगे    वहाँ धमाल।

कट जाएंगे       मेरे बाल

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बूआ सब आँचल फैलाए।

बैठी होंगी   दाएं - बाएं॥

हो जाएंगी     मालामाल।

कट जाएंगे      मेरे बाल॥

कोट माई’ के दर जाएंगे।

कटे बाल को  धर आएंगे॥

‘माँ’ रखती है हमें निहाल।

कट जाएंगे      मेरे बाल॥

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हल्दी, चन्दन, अक्षत, दही।

पूजा की थाली खिल रही॥

चमक उठेगा    मेरा भाल।

कट जाएंगे      मेरे बाल॥

मम्मी    रोज करें बाजार।

गहने, कपड़े   औ’  श्रृंगार॥

बटुआ ढीला - डैडी ‘लाल’।

कट जाएंगे      मेरे बाल॥

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बाबू (14)

अब तो होगी मेरी  मौज।

नये खिलौनों की है फौज॥

मुण्डन होगा बड़ा कमाल।

कट जाएंगे      मेरे बाल॥

सभी अंकल्स और आण्टियों को सादर प्रणाम! भैया-दीदी को नमस्ते

-सत्यार्थ